रामायण-महाभारत तथा नए शोधों के आलोक में भारत के आर्य एवं अनार्य
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| Source: wiseGeek |
सभी हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में “ जंबूद्वीपे आर्यावर्ते भारतखंडे” वाक्य आर्यों के निवास स्थान के रूप मेँ अंकित है। पुरोहित जी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान मेँ इन शब्दों के उच्चारण के साथ आपके गोत्र, पिता का नाम और उसके बाद आपका नाम उच्चारित कराते हैं,यानि आपका परिचय जंबूद्वीप(महादेश)के भारत देश आर्यावर्त नामक भूखंड के निवासी होने का है। आर्यावर्त का मतलब आर्यों का निवास स्थान।
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| Aryavarta Flag (Source: Reddit) |
आर्यावर्त- हिमालय से लेकर विंध्यपर्वत के बीच तथा द्वारिका से लेकर त्रिपुरा, मणिपुर तक फैला था। लेकिन कुछ चक्रवर्ती सम्राटों ने विंध्याचल के पार तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था।विंध्याचल के पार दंडकारण्य का क्षेत्र था।दंडक एक असुर था ,जो इस जंगल में निवास करता था, तथा इसके नरभक्षी भी होने की मान्यता थी।, कर्नाटक यानि किष्किनधा तक इसका विस्तार था।
राम और कृष्ण के काल मेँ प्रमुख जातियाँ(race) तथाकथित रूप आर्य और अनार्य(यानि जो आर्य नही थे)।उस समाज में स्पष्ट रूप वर्ण विभाजन नहीं हुआ था, फिर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं शूद्र के रूप मोटा मोटी बंट गया था, कोई छूआ छुत नहीं था। लेकिन कुछ वर्ण जतियों एवं उपजातियों मे विभक्त हो रही थी।एक वर्ण एक से दूसरे मे परिवर्तित भी हो रहे थे।जतियों में संकीर्णता और कट्टरता नहीं आई थी।
ऋषि-मुनि एवं महर्षि - आर्यों में अपने वर्ण, जाति,उपजाति से इतर कोई भी व्यक्ति अपने आध्यात्मिक,बौद्धिक उन्नति हेतु ऋषि,मुनि बन सकता था।ज्यादा सीद्धि वाले वरीय ऋषि को महर्षि कहा जाता था। ऋषि,मुनि महर्षि अपने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु अपना आश्रम या कुटिया या एकांत जंगल में बनाया करते थे।ये आश्रम या गुरुकुल शिक्षा का केंद्र हुआ करते थे,जहां राजनीतिशास्त्र,वेद,उपनिषद,ज्योतिष शास्त्र,गणित,साहित्य के साथ युद्धकला एवं नीति की शिक्षा दी जाती थी। साथ ही ऋषि मुनिजंगलों में अवस्थित इन आश्रमों के द्वारा आर्य संस्कृति के प्रसार हेतु प्रायः यज्ञ किया करते थे जिसमें असुरों के द्वारा बिघ्न बाधा पैदा किए जाते थे, कन्याओं औरतों का बलात्कार किया करते थे।तत्कालीन आर्य राजाओं के द्वारा असुरों के अत्याचार से उनसे युद्ध कर रक्षा किया करते थे।
ब्रम्ह्र्र्षि -कुछ ब्राह्मण परशुराम के नेतृत्व में अपनी वृति छोड़ कर शस्त्र धारण कर लिया था औरक्षत्रियों को युद्ध में पराजित कर उनकी भूमि संपत्ति को छिन कर कृषक बन गए थे,यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा।
सुर- ऊपरी हिमालय क्षेत्र में निवास करते थे।ये बौद्धिक,आध्यात्मिक ,वैज्ञानिक थे।
असुर - यानि दैत्य, दानव, दस्यु, राक्षस, नाग, यक्ष, किन्नर आदि समान्यतः विंध्याचल के दक्षिण से लंका तक था। लेकिन कुछ छिट पुट असुरों के राज्य आर्यावर्त में भी थे। कुछ जातियाँ अपने पहचान के लिए टोटेम के रूप मेँ नाग, गरुड, रीक्ष, वानर, महिष आदि नाम का प्रयोग करते थे। जिसके प्रतीक चिन्ह को अपने पहचान के लिए पहनते थे, जैसे- अपने टोटेम का मुखौटा, जानवरों के सींग, पुंछ, पंख आदि, जो सूर्य को अपना कूलदेवता मानते थे यानि सूर्यवंशी थे वे सूर्य का पहचान चिन्ह तथा चन्द्रवंशी अपने अलग पहचान के लिए चन्द्र का प्रतीक चिन्ह प्रयोग करते थे, इसी प्रकार अन्य वंश या जातियाँ दूसरे से अपने को अलग करने के लिए अलग अलग totem का प्रतीक चिन्ह का प्रयोग करते थे। (डा0 रांगेय राघव का “महागाथा”)
ब्रम्ह्र्र्षि -कुछ ब्राह्मण परशुराम के नेतृत्व में अपनी वृति छोड़ कर शस्त्र धारण कर लिया था औरक्षत्रियों को युद्ध में पराजित कर उनकी भूमि संपत्ति को छिन कर कृषक बन गए थे,यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा।
सुर- ऊपरी हिमालय क्षेत्र में निवास करते थे।ये बौद्धिक,आध्यात्मिक ,वैज्ञानिक थे।
असुर - यानि दैत्य, दानव, दस्यु, राक्षस, नाग, यक्ष, किन्नर आदि समान्यतः विंध्याचल के दक्षिण से लंका तक था। लेकिन कुछ छिट पुट असुरों के राज्य आर्यावर्त में भी थे। कुछ जातियाँ अपने पहचान के लिए टोटेम के रूप मेँ नाग, गरुड, रीक्ष, वानर, महिष आदि नाम का प्रयोग करते थे। जिसके प्रतीक चिन्ह को अपने पहचान के लिए पहनते थे, जैसे- अपने टोटेम का मुखौटा, जानवरों के सींग, पुंछ, पंख आदि, जो सूर्य को अपना कूलदेवता मानते थे यानि सूर्यवंशी थे वे सूर्य का पहचान चिन्ह तथा चन्द्रवंशी अपने अलग पहचान के लिए चन्द्र का प्रतीक चिन्ह प्रयोग करते थे, इसी प्रकार अन्य वंश या जातियाँ दूसरे से अपने को अलग करने के लिए अलग अलग totem का प्रतीक चिन्ह का प्रयोग करते थे। (डा0 रांगेय राघव का “महागाथा”)
काशी, कोशल(उत्तर एवं दक्षिण), जनकपुर, कईकेय, लंका, किष्किंधा, पताल पुरी, दंडकरणय, अंगदेश, पांचाल तक्षशिला, गांधार हस्तिनापुर माहिष्मती, श्रावस्ती मथुरा प्रतिस्थान,बंगगआदि इसके अतिरिक्त अन्य राज्य भी थे
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| Source: Webdunia |
गांधार, कंबोज, पारिजात्र, सिंधु, सौबीर, आमिर, तक्षशिला, वलहिक , कौशम्बी, मल्ल, यवन, कैकेय, हस्तिनापुरइंद्रप्रष्थ, पांचाल, कुंतिभोज, विदिशा, उज्जयिनी, कोसल, काशी, मगध, पौन्ड्र, औंड्र, उत्कल, महेंद्र, कलिंग, द्वारिका, सौराष्ट्र, कच्छ, विराट अवन्ति, अंग, आदि |
राम और कृष्ण के जीवन का काल खंड–
महाभारत काल के कई नक्शे उपलब्ध हैं-
धार्मिक ग्रन्थों, के अनुसार पृथ्वी पर कुल 7 महाद्वीप थे --- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, कोंच, शाक, पुष्कर।
जम्बूद्वीप इन द्वीपों के बीच में अवस्थित था।
जम्बूद्वीप मेँ 9 खंड थे, जिसमें विभिन्न कालों में विभिन्न देश या राज्य थे, राज्यों के नाम और सीमा रेखाएँ राजाओं के आपसी युद्धों के कारण बदलती रही हैं। जम्बूद्वीप के 9 खंड --- इलावृत, भदाश्व, किंपुरूष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु, हिरण्यमय ।
धार्मिक कथाओं के अनुसार जंबुद्वीप पर पहले असुरों काआधिपत्य था। इस पर आधिपत्य बनाने के लिए सुरों एवं असुरों के बीच लंबे अवधि तक संग्राम चलता रहा। धरती पर अपने कूल के विस्तार हेतु मधु और केटव नामक असुरों का बध कर आधिपत्य जमा लिया, पुनः राजा बलि (असुर राज ) ने इंद्र को हरा कर पूरे जम्बूद्वीप पर अपना राज कायम किया। अंतिम बार शंबासुर के साथ हुये युद्ध मेँ राजा दशरथ ने भी भाग लिया था जिसमें असुरों का पराजय हुआ था। लेकिन छिट- पुट युद्ध जारी रहा, जिसमें कई देवी देवताओं ने युद्धों का नेतृत्व किया।
राम के काल खंड का कोई पुरातत्वीय एवं ऐतिहासिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं,धार्मिक ग्रन्थों मेँ रामायण, जिसके रचयिता महर्षि बाल्मीकी थे ,को राम का समकालीन माना जाता है,राम के जन्म के समय बाल्मीकी रामायण में ग्रहों- नक्षत्रों की स्थिति का जो वर्णन किया गया है,उसके आधार पर राम के जन्म तिथि की गणना शोध कर्ताओं से manual संभव नहीं हुआ तो,कम्प्युटर के software से भी प्रयास किया गया लेकिन इसमे भी सफलता नही मिली,तब अन्य धार्मिक ग्रंथ यथा ऋग्वेद(वाचित एवं लिखित) में राम के पूर्वजों के वर्णन के आधार पर गणना किया एवं मोटा मोटी राम के जन्म का अनुमान लगाया गया।
लेकिन कृष्ण के जन्म की तिथी का धार्मिक ग्रन्थों में किए गये वर्णन एवं द्वारिका नगरी के अवशेषों की काल गणना से कृष्ण के कालावधि की अनुमानित गणना की जा सकी है।
इतिहास मेँ वर्णित कई सभ्यताओं के
काल खंडों से राम एवं कृष्ण के काल की तुलना निम्नवत की जा सकती है---
- हड़प्पा संस्कृति--------10000ईसा पूर्व से प्रारम्भ
- सिंधुघाटी की सभ्यता—7000 से1900 ईसा पूर्व
- मिस्र की सभ्यता-------7000से 3000 ईसा पूर्व
- मेसोपोटामियाकी सभ्यता-6500-3000 ईसा पूर्व
- श्रीराम का कालावधि------5114 ईसा पूर्व
वास्तव रामायण ----------- 7323 ईसा पूर्व (रचयिता-डाoकार्क के अनुसार)
श्रीकृष्ण का कालावधि ------- 3228 ईसा पूर्व
हड़प्पा संस्कृति का पतन शुरु-------- 3220 ईसा पूर्व
इस चार्ट से तुलनात्मक रूप से श्रीराम एवं श्रीकृष्ण के कालावधि का मोटा मोटी अनुमान हो जाता है।
आर्य संस्कृति
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| Source: Scroll.in |
मैक्समूलर, विलियम हंटर, लौर्ड थौमस, बैविग्टन आदि इतिहासकारों ने आर्यों के मद्य एशिया के स्टेफ़ी घास के मैदानों से भारत में आव्रजन का सिद्धान्त दिया, यानि आर्य भारत मेँ बाहर से आकर यहाँ के तत्कालीन मूल निवासियों(अनार्यों) से संघर्ष कर बसते गये।
आर्य- पढे लिखे, अपनी भाषा एवं लिपि वाले, सुसंस्कृत, युद्धकला मेँ बेहतर, कृषि कार्य के जानकार, वेदों के रचयिता थे।
देव- वैसे आर्य जो ऊपरी हिमालय के क्षेत्र मेँ निवास करते थे, जो ज्यादा शिक्षित, तकनीकी एवं आध्यात्मिक रूप से ज्यादा, उन्नत, अस्त्र - शस्त्र, प्रक्षेपास्त्र, वैमानिक तकनीक के ज्ञाता एवं प्रयोगकर्ता थे। जिसके राजा इंद्र थे जो एक पद था। जिनके आदिदेव ब्रम्हा, विष्णु एवं महेश थे, इन्हें प्रशन्न कर अस्त्र –शस्त्र, प्रक्षेपास्त्र आदि प्राप्त किया का सकता था। प्रायः देवों को ऊपर से उतरते हुये दर्शाया जाता है, यह एक प्रतीक है ऊपरी हिमालय से नीचे आने का।
असुर- इस नयी सभ्यता (आर्यों) के आने के पूर्व भारत के निवासी थे, जिसमें यक्ष, किन्नर, गंधर्व, दैत्य, दानव, दस्यु, राक्षस, कोल, भील। ये आपस मेँ संघर्षरत रहते थे। यक्षराज कुबेर जो अपार धन संपत्ति के मालिक थे जो राक्षसराज रावण के सौतेले भाई भी थे और लंका मेँ ही रहते थे, रावण ने उनकी संपत्ति लूट ली थी, कुबेर ने भाग कर कैलाश पर्वत क्षेत्र मेँ निवास स्थान बनाया था।
दस्यु,दानव,राक्षस- योद्धा, वेश बदलने मेँ निपुण, दूसरों के धन, संपत्ति, सुंदर स्त्रियॉं का अपहरण, बलात्कार, नरभक्षी, तपस्वियों, ऋषियों, मुनियों को प्रताड़ित करना, मांस-मदिरा का सेवन करना, मुख्य निवास स्थान दंडकारण्य एवं इसके दक्षिण के लंका तक का भाग। चूंकि ये जंगलों मेँ निवास करने के कारण कृषियोग्य भूमि की कमी , सिंचाई सुविधा का अभाव, जंगली पशुओं से कृषि , फसलों की सुरक्षा के अभाव के कारण लोग आज भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा मांसाहारी मदिरा सेवन करते हैं। जिसके साथ अन्य दुर्गुण स्वभाविक रूप से आ जाते हैं।
आधुनिक शोध
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| Source: myIndianmyGlory |
आधुनिक शोधों ने मैक्समूलर के आर्यन इंवेजन थ्योरी को गलत सिद्ध किया है जिसके अनुसार आर्य बाहर से भारत आए थे और हड़प्पा संस्कृति, द्रविड़ (अनार्य) लोंगों की सभ्यता थी। हावर्ड वि0 वि0 एवं सीसीएमबी के वरिष्ठ विश्लेषक कुमारसमय थंगराज के अनुसार आर्यों और द्रविड़ , या उत्तर भारतीय और हजारों वर्ष पूर्व आए दक्षिण भारतीय (अनार्य यानि असुर,राक्षस आदि) दोनों के डीएनए एक ही है, यानि उत्पत्ति एक ही है। डीएनए का सैंपल भारत के समस्त भाग, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अंडमान निकोबार से संग्रहीत किए गए थे जो एक समान पाये गए।
आइ आइ टी खड़गपुर एवं भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार सिंधु घाटी की सभ्यता 8000 साल पुरानी है और मिस्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता से पुरानी थी।
राजस्थान के भीलवाडा के कोठारी नदी के किनारे बागोर तथा मध्यप्रदेश के होशंगाबाद आदमगढ़ में 9000 ईसापूर्व में धनुषबाण एवं घोड़े कि सवारी कि चित्रकारी से स्पष्ट होता है कि भारत में 9000 ईसापूर्व में घोड़ों पर शिकार करते थे।बोगोर में 5 मानव कंकाल पाये गए हैं।
इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में आर्य बाहर से नहीं आए थे,बल्कि वे यहीं विकसित हुये थे,सभी निवासियों के गुणसूत्रों के एक पाये जाने से भी स्पष्ट होता है कि ये सभी एक ही पूर्वजों की संतान हैं।अंग्रेजों के द्वारा उत्तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय को आर्य एवं अनार्य के रूप मे बांट कर अपने को शासन में बनाए रखने का उपक्रम था। अब समय आ गया है नए शोधों एवं हरियाणा में हाल पुरातत्वीय खुदाइयों में प्राप्त अवशेषों के आधार पर नये ढंग पुनः भारत का इतिहास लिखा जाय।
शैलेंद्र






Very thoughtful, innovative knowledgeable ideas.
ReplyDeletePure Bharat varsh ki savyata Sanskriti ki jankari is ek article m smayi h
Delete👍👍
Deleteधन्यवाद
DeleteVery informative article...👍👍👍
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteसादर प्रणाम सर बहुत ही दुर्बल ज्ञान हमारे मन मस्तिष्क में आपके भेजे गए पोस्ट के माध्यम से उपलब्ध हो पाया चरण स्पर्श सर साथ ही साथ जुदाई तल की गहराई से आभार प्रकट करता हूं सर
Deleteअद्भुत सर, आपके एक नए व्यक्तित्व के दर्शन के साथ-साथ हमें भी एक नया दृष्टिकोण प्राप्त हो रहा है।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद!!
Deleteबहुत ही अच्छा है सर। आप काल, उस समय का क्षेत्र विस्तार, इस क्षेत्र में रहने वाले लोग के बारे में बहुतही विस्तृत जानकारी साझा किए हैं।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद!!
Deleteतथ्यों के बारे में टिप्पणी करने का स्तर मेरा नहीं है, लेकिन लेखनी अच्छी है।
ReplyDeleteVery knowledgeable ideas 😀
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